Saturday, 19 April 2014

     2013  को 20  जुलाई की सुबह हमलोगो ने अपनी यात्रा कच्छ से शुरु की। कच्छ गुजरात प्रांत का एक ज़िला हैं। गुजरात यात्रा कच्छ जिले के बिना अधूरी मानी जाती हैं। पर्यटकों को लुभाने के लिए यहाँ बहुत कुछ हैं। जिले का मुख्यालय है भुज। 45 ,652  वर्गकिलोमीटर के क्षेत्रफल में फैले गुजरात के इस सबसे बड़े ज़िले का अधिकांश हिस्सा रेतीला और दलदली हैं। कांडला, मुंद्रा और जखाऊ यहाँ के मुख्य बंदरगाह हैं।

     हमारी टैक्सी तेज रफ़्तार के साथ भुज की ओर बढ़ने लगी । गांधीधाम से 70 किलोमीटर लम्बा रास्ता हमें तय करना था। काफी दूर तक सड़के सीधी थी। कुछ देर बाद हमारी टैक्सी घुमावदार सड़कों पर दाखिल हो गई । सड़क साफ़-सुथरी और खाली थी । हवाओं से बात करने का इससे अच्छा अवसर कहां हो सकता था ।टैक्सी के लिए और हमारे लिए भी । पहाड़ो की पीठ कभी हमारे दायें तो कभी हमारे बायें हो रही थी । पठारी इलाकों में जितनी हरियाली की अपेक्षा बरसात के मौसम में होती, उतनी हरियाली नहीं दिख रही थी, क्योकि हम शिमला, मनाली, ऊटी, केरल, कोडई-कनाल हुए हरियाली से तुलना कर रहे थे, फिर भी शुष्क इलाकों में काफी हरियाली थी क्योकि इस वर्ष कच्छ प्रांत में काफी बरसात देखने को मिली। सूरज हल्का ललछौंहा रंग बिखरा रहा था। रास्ते के दोनों ओर खेत -खलिहान संग भागते दृश्य देखने का विचित्र मज़ा था। आम एवं ख़जूर के पेड़ से लगे खेत का नज़ारा काफी मनोरम था। ख़जूर के झूमते पेड़ से लाल या पीले रंग के फलों के गुच्छे, बड़े मोतियों की माला की तरह ख़जूर के गले को सुशोभित कर रहे थे । कच्छ के ख़जूर का फल काफी बड़ा और शहद की तरह मीठा होता है, इसकी माँग न केवल भारत में बल्कि विदेश के काफी देशों में होती है।

     एकाएक हमारी टैक्सी रुकी, हमलोग भुज के स्वामीनारायण मंदिर पहुँच  गए । मैं , किरण, मेरी भांजी, और मम्मी -पापा टैक्सी से  उतरे। सफ़ेद संगमरमर से निर्मित स्वामीनारायण मंदिर, वास्तुकला का अदभूत नजारा था । लाल- नारंगी सूरज  की किरणें, विशाल सफ़ेद मंदिर पर  बिखर रही थी और हरियाली भरे बाग़-बगीचे, तीनों मिलकर, भारतीय तिरंगा की याद  दिलाने लगी । सभी देवी -देवताओं की मूर्तियाँ सोने से निर्मित थी ।

                              (Swaminarayan temple, Bhuj)


           दो घंटे मंदिर में  बिताने के बाद हमलोगों का अगला पड़ाव माँ आशापुरा मंदिर (माता नो मढ) था, जो भुज से 95 किलोमीटर दूर था। हमारी टैक्सी बढ़ने लगी । वारिश के हल्के फुहारे पड़ने लगे । मौसम सुहाना हो गया। ख़जूर के फलों से लदे पेड़ की खूबसूरती, वारिश के फुहारे से और बढ़ गयी । 11 बजे सुबह हमलोगों मंदिर गए । पूजा-अर्चना करने के बाद हमलोगों ने भोजन ग्रहण किया जो वहां प्रसाद के रूप मे निशुल्क उपलब्ध था । शक संवत 1300 में कच्छ के जडेजा राजपूत राजाओं ने इस मंदिर को बनबाया था जो कुलदेवी के नाम से पूजा करते थे । ऐसा माना  जाता हैं माँ आशापुरा, हर मन्नतें पूरी करती हैं । नवरात्री के समय काफी श्रदालु माता के दर्शन के लिए आते हैं ।

                              (Maa Aashapura Temple)
   
     अब हमलोग नारायण सरोवर की ओर बढ़ने लगे, जो माता आशापुरा मंदिर (माता नो मढ) से 57 किलोमीटर की दूरी पर हैं । नारायण सरोवर, गुजरात प्रांत के कच्छ जिले के लखपत तालुका में स्थित हिन्दुओं का पवित्र तीर्थस्थान हैं । नारायण सरोवर का अर्थ है, "भगवान विष्णु का सरोवर" । यहाँ सिंधु नदी का सागर से संगम होता हैं । इस नदी के तट पर पवित्र नारायण सरोवर हैं । हिन्दुओं के पांच पवित्र झील, जो कि तिब्बत का मानसरोवर झील, कर्नाटक का पाम्पा झील, ओड़ीसा का बिन्दुसगार झील, राजस्थान का पुष्कर झील के साथ नारायण सरोवर झील भी एक हैं। पवित्र नारायण सरोवर के तट पर भगवान आदित्यनारायण का प्राचीन भव्य मंदिर हैं । इस झील के साथ एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। अकाल के समय साधुओं की प्रार्थना सुनके नारायण (भगवान विष्णु) धरती पर अवतरित हुए । उन्होनें पाँव के अंगूठे से धरती को जहाँ छुआ वहाँ एक झील बन गई । कार्तिक पूर्णिमा से तीन दिन का भव्य मेला यहाँ आयोजित होता हैं । इस सरोवर में श्रदालु अपने पित्तरों का श्राद्ध भी करते हैं ।

                                      (Narayan Sarovar)

     
                       (Koteshwar Mahadev, Temple)    
     
       इसके उपरान्त हमलोग प्राचीन शिवमंदिर कोटेश्वर गए, जो नारायण सरोवर से 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं । यह अरब सागर के कोड़ी क्रीक के सदूर पश्चिमी छोर पर स्थित अंतिम आउटपोस्ट हैं, इसके विपरीत दिशा में पाकिस्तान का कराँची शहर अवस्थित हैं । कराँची बंदरगाह की रौशनी साफ़ आकाश में रात्रि के समय देखी  जा सकती हैं । इस मंदिर के बारे में ऐसी मान्यता हैं की दुष्ट अहंकारी रावण, भगवान शिव से वरदान लेकर, भगवान शिवशंकर को शिवलिंग के रूप में लेकर जा रहे थे। एकाएक कोटेश्वर में शिवलिंग हाथ से छूटकर धरती पर गिर गया और शिवलिंग,  हज़ारों सामान शिवलिंग में परिवर्तित हो गया और रावण को खाली हाथ लौटना पड़ा । इस इलाकें में सीमा शुल्क आयुक्तालय, कच्छ के अधिकारियों और कर्मचारियों को पाकिस्तान की तरफ  से तस्करी और गैरकानूनी कार्यों को रोकने के लिए काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, और इसमें ये काफी निपुण है और सीमा शुल्क आयुक्तालय, कच्छ और देश का नाम ऊँचा करते है । इनको भरपूर सहयोग सीमा सुरक्षा बल, कोस्टल गार्ड, खुफिया एजेंसी और स्थानीय पुलिस से मिलता हैं।

       हमारी टैक्सी अब लखपत के प्राचीन किले की ओर बढ़ने लगी । आधा घण्टे के बाद हमलोग किले के अंदर थे । किले के अंदर ही एक प्राचीन गुरुद्वारा था। लखपत, पाकिस्तान से सटे हुए भारत का छोर हैं, जो रेगिस्तानी हैं ।

       
     
                         (Manvi Beach, Mandvi, Gujarat)
   
        लौटते वकत हमलोग मांडवी बीच के लिए निकल पड़े। मांडवी बीच पहुँचते वक़्त शाम होने लगी थी । टैक्सी से निकलने पर सभी के चेहरे थके-थके लग रहे थे। घनघोर आवाज करती हुई समुद्र की लहरें हमें तट पर बार -बार छूने के लिए दौड़ रही थी । ठंडी समुद्री हवाओं में घुली तरलता ने अब हमारे चेहरें से थकान की परतों को धो दिया। अब हमलोगों से रहा न गया और समुद्री लहरें का मजा लेने लगे । कभी मै पानी के ऊपर तैरता तो कभी पानी मेरे ऊपर। डूबते सूरज का अदभूत दृश्य था। ऐसा लगा मानो सूरज सुबह समुद्र से ही निकलता है और शाम को थककर समुद्र की गोद में विश्राम करने चला जाता हो । तट से लगी कतारबद्ध पवनचकियां खड़ी थी, जो समद्री हबाओं की धुन पर नाच रही थी । फिर हमलोगों ने दावेली का मजा लिया। बाद में पता चला की, इसकी खोज वर्ष 1960 में केशवजी गभा चुरासभा ने की । इस स्थानीय रोटी, दावेली कच्छ में प्रसिद्ध हैं, तट से सटे एक बंदरगाह हैं, जहाँ सीमा शुल्क आयुक्तालय, कच्छ के अधिकारियों और कर्मचारियों, सीमा शुल्क कार्यालय में अपनी सेवाएं देते हैं। 1574 में, मांडवी के राजा खेंगार्जी ने इस शहर की स्थापना बंदरगाह शहर के रूप में की । उस समय 400 जहाजों का बेड़ा था जो, यूरोप, एशिया, अफ्रीका, फारस की खाड़ी, मालावार तट से जहाज इस बंदरगाह पर आते थे। यहाँ बड़े जहाज आने की पर्याप्त सुबिधा नहीं हैं, फिर भी रुकमावती नदी किनारे स्थित जहाज बनाने के शिपयार्ड हैं, जहाँ हाथ से बने हुए लकड़ी के बड़े जहाज देखे जा सकते है । मांडवी की यात्रा के बिना, कच्छ की यात्रा, अधूरी मानी जाती हैं।

     हमलोग, वहां से 10 मिनट की दुरी पर विजय विलास होटल पहुंचे। इसके दो कमरें पहले बुक करवा लिया था । हल्का-फुल्का खाना खाया और होटल में जाकर अपने-अपने विस्तर पर पसर गए। हमारे पास तरह-तरह की स्मृतियों का एक भरा-पूरा भंडार था । थोड़ी देर बाद आँखें लग गई। जब सुबह उठे तो अपने को तरोताजा महसूस कर रहे थे । हमलोगों ने सुबह नाश्ता करके विजय विलास पैलेस, को शहर से 7 किलोमीटर की दूरी पर था। यह लाल बलुआही पत्थर से बना हुआ था। इसका निर्माण राव विजयराम जी ने 1929 में किया । यह महल मांडवी के आकर्षण का प्रमुख केंद्र हैं। अब अगला पड़ाव कच्छ से बाहर, भगवान श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका था। हमलोग निकल पड़े। राष्ट्रीय उच्चपथ-8 से भागती हुई टैक्सी जामनगर की ओर बढ़ रही थी। रास्तें के दोनों ओर हरियाली का मंजर था। खेतों में कपास के पौधें कतारवद्ध दिख रहे थे। मवेशी के चारे के फसल भी लगे थे। रास्तें में वारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें स्वागत करने लगी, जैसा पीछा न छोड़नें की कसम खा रखी हो। टैक्सी वारिश में नहाते हुए जामनगर पहुँच गयी । जामनगर से 137 किलोमीटर की दूरी और तय करनी थी। हमलोगों ने रेस्टोरेंट में चाय और गर्मागर्म पकौड़े का भरपूर मजा लिया । वारिश की बड़ी बूंदे अब हल्की फुहारे में गयी। सड़क के दोनों और हरियाली का बेहद खुबसूरत नजारा था, ऐसा आभास हो रहा था मानों किसी ने हरी मखमली कालीन आगुन्तकों का स्वागत करने के लिए बिछा रखा हो। सैकड़ों मवेशियों झुंड बनाकर घास और झाड़ियाँ खा रही थी। भगवान श्री कृष्ण की नगरी में गायों को देखकर उनके बचपन की कहानियाँ याद आने लगी। सैकड़ों पवनचकियां नाचती हुई स्वागत  कर रही थी, जैसे जैसे बोल रही हो श्री द्वारकाधीश की नगरी में आपका स्वागत है, आने के लिए धन्यवाद ।

                              (Dwarka Temple, Gujarat)
 
       टैक्सी से ही काफी ऊँचाई पर लहराता हुआ विशाल ध्वज दिखने लगा । हमलोग समझ गयें कि यही श्री कृष्ण का मंदिर हैं।गाड़ी के अंदर से ही हमलोगों ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया। द्वारका पहुँचते ही, होटल द्वारका में कमरा बुक करके, हमलोगों थोड़ी देर आराम करके, गुजराती थाली का भरपूर मजा लिया। हमलोग नहाकर फटाफट तैयार हुए और बेट द्वारका जाने का निर्णय किये, जो वहां से 31 किलोमीटर की दूरी पर था। वारिश हो रही थी, रास्तें में टाटा नमक एंड केमिकल की विशाल फैक्ट्री थी। सड़क का निर्माण कार्य चल रहा था, इसलिए मेरी टैक्सी धीरे-धीरे बढ़ रही थी। ओखा, पहुँचने से पहले लगभग 2 किलोमीटर तक सैंकड़ों नौकाएं, सड़क के किनारे, तिरंगा ध्वज लहराती हुई खड़ी थी, जो स्थानीय लोगों से पूछने पर मालूम हुआँ कि ये नौकाएं मछुहारें की हैं, समुद्री जलस्तर अभी बरसात में बढ़ी हुई है, इसलिए प्रशासन के आदेशानुसार, अभी समुद्र में ले जाना मना हैं । हमलोग ओखा पहुँच गये। छोटी जहाज, बेट द्वारका जाने के लिए खड़ी थी। हमलोग टैक्सी से उतरकर उसमे चढ़ गए। जय श्री कृष्णा की जयघोष के साथ जहाज चल पड़ी। चारों ओर जल ही जल दिखाई दे रहा था। छोटी टापू वहां से दिखाई दे रही थी। बेट द्वारका छोटी टापू पर स्थित हैं। वारिश की बड़ी-बड़ी बूंदे पर रही थी, हमलोग भींग गए थे। बेट द्वारका में भगवान श्री कृष्ण की प्राचीन मंदिर हैं। मंदिर में हमलोगों ने पूजा-अर्चना की। इस मंदिर में लक्ष्मी-नारायण, त्रिविक्रम, जम्बावती सत्यभामा देवी और रुक्मणी देवी की मूर्तियाँ थी । लौटते वक़्त हमलोगों ने गर्मागर्म चाय-भजिया का मजा लिया। हस्तशिल्पकला के कुछ सामान एवं भगवान की मूर्तियां खरीदी, फिर लौटती नौकाएं से वापस आ गये । डूबते हुए सूर्य की लाल रौशनी समुद्री जल पर बिखर रही थी।

      अब हमलोग रुक्मणी देवी के मंदिर पहुंचे, जो द्वारका शहर से 1.5 किलोमीटर उत्तर की ओर हैं। 12 वीं शताब्दी की बनी भव्य प्राचीन मंदिर, वास्तुकला और चित्रकला की अदभूत मिसाल थी । मंदिर में रुक्मणी देवी की मूर्ति हैं। कहा जाता है कि ऋषि दुर्वासा ने गुस्से में महरानी रुक्मणी को भगवान श्री कृष्ण से अलग होने का श्राप दिया। इसलिये ये मंदिर द्वारकाधीश शहर से थोड़ी दुरी पर हैं।

                                 (Rukshamanee Mandir)

     संध्या आरती के समय 8.30 हमलोग श्री द्वारकाधीश मंदिर पहुँचे। यह मंदिर गोमती नदी के संगम पर बना हुआ है , जो अरब सागर से मिलती है। मंदिर के दो दरवाजे हैं। स्वर्ग द्वार, जिससे श्रद्धालु अंदर आते हैं और मोक्ष द्वार जिससे दर्शन कर बाहर निकलते हैं । गरुड़ पुराण के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए 8 जगहों का वर्णन है । वें हैं - अयोध्या , मथुरा , माया , काशी , कांची, अवंतिका, पुरी, और द्वारका । मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी थी । भीड़ कम थी । हम लोगों ने अच्छे से भगवान के दर्शन किये ।

                 (Holy river gomti meet with Arabian Sea 'Sangam')
      
      यह मंदिर लगभग 100 फीट ऊँची बलुआही पत्थर से बना हुआ हैं। यह शिल्पकला और वास्तुकला का बेजोड़ नमूना हैं । मंदिर के दो  शिखर है, निज शिखर के अंदर ही भगवान द्वारकाधीश की  मूर्ति लगभग सवा दो फीट ऊँची रखी हुई हैं। उनके चारों हाथ में शंख, चक्र, गदा और कमल के फूल हैं। मंदिर में वासुदेव, देवकी, बलराम, रेवती, सुभद्रा, रुक्मणी देवी, जमवावती देवी, सत्यभामा देवी, की मूर्तियाँ हैं।

     ऐसा माना जाता है कि 5000 वर्ष पहले, द्वारका श्री कृष्ण की नगरी थी, जिसे भगवान विश्वकर्मा ने बनाया था, जो महाभारत में भी वर्णित हैं । श्री कृष्ण की मृत्यु के बाद यह शहर समुद्र में डूब गया, जो वर्तमान मंदिर से 9 किलोमीटर पानी के अंदर 100 मीटर नीचे डुबी हुई हैं । श्री कृष्ण के बड़े परपौत्र ने इस मंदिर का निर्माण करवाया।

     द्वारका की व्युत्पत्ति:- ''द्वार'' का मतलब दरवाजा और ''का'' की उत्पत्ति मोक्ष से हुई है, जिसे मोक्षप्राप्ति का द्वार कहा जाता हैं। इस शहर को मोक्षपूरी के नाम से भी जाना जाता हैं। ये चार धामों में से एक है , जो वद्रीनाथ, पुरी, रामेश्वरम के साथ आता हैं । आदि शंकराचार्य ने भी चार पीठ की स्थापना की जो द्वारकापीठ के अलावा श्रृंगेरी, पुरी, और ज्योतिर्मठ हैं।

     हमलोग मंदिर से सीधा होटल पहुँचे। खाना-खाकर सो गए। सुबह जल्दी उठे। स्नान करके हमलोग तैयार हुए और सुबह आरती में भाग लिए। सुबह भीड़ काफी थी। हमलोग द्वारका से नागेश्वर मंदिर पहुंचे, जो वहां से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हमलोगों ने पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए । मंदिर के प्रांगण में ही भगवान श्री शिव की विशालकाय मूर्ति बनी हुई हैं। यह शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं। इस पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन की शास्त्रों में बड़ी महिमा बताई गयी हैं । कहा गया है कि जो श्रद्धापूर्वक इसकी उत्पत्ति और महात्मय की कथा सुनेगा वह सारे पापों से छुटकारा पाकर समस्त सुखों का भोग करता हुआ अंत में भगवान श्री शिव के परम पवित्र दिव्यधाम को प्राप्त होगा ।

                            (Naageshwar Temple, Dwarka)
                     (God Shiva, Naageshwar Temple, Dwarka)

      अब हमलोगों का अगला पड़ाव पोरबन्दर था, जो द्वारका से 104 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं । पोरबन्दर बहुत ही पुराना बन्दरगाह हुआ करता था । 10 वीं शताब्दी में पोरबन्दर को पौरवेलाकुल और बाद में इसे सुदामापुरी भी कहा जाता था । भगवान श्री कृष्ण के बालसखा सुदामजी यही के थे। महात्मा गाँधी जी का जन्मस्थल होने के कारण इस शहर का खास महत्व हैं । 2 घण्टे की यात्रा के बाद हमलोग कीर्तिमंदिर पहुँचे। अंदर प्रवेश करते ही गांधी जी और कस्तूरबा जी के सम्पूर्ण कद के तैलचित्र दिखाई देते हैं । इसमें एक गाँधीवादी पुस्तकालय और प्रार्थना कक्ष हैं । कीर्तिमंदिर परिसर में महात्मा गाँधी जी के बचपन का तिमंजिला पैतृक निवास है, जहाँ ठीक उस स्थान पर एक स्वास्तिक चिन्ह बनाया गया है, जहाँ माता पुतलीबाई ने महात्मा गाँधी जी को जन्म दिया । हमलोगों ने वहाँ फूल माला चढ़ाये। अहिंसा के पुजारी के इस कक्ष में कुछ क्षण बिताने के बाद मन को अदभूत शांति मिली। लकड़ी की संकरी सीढ़ी से ऊपरी मंजिल में गये, जहाँ गाँधीजी का अध्ययन कक्ष है। प्रत्येक कमरें में उनकी कुछ-कुछ यादें रखी थी। गाँधीजी के जन्म की स्मृति को अमर बनाने के लिए 79 फीट ऊँची एक इमारत का निर्माण उस गली में किया गया जहाँ 2 अक्टूबर 1869 को बापू का जन्म हुआ था। कीर्तिमंदिर के पीछे नवी खादी है, जहाँ महात्मा गाँधी की पत्नी कस्तूरबा गाँधी का जन्म हुआ था। वहाँ भी सभी कक्ष के अंदर गाँधी जी की अलग-अलग समय की तस्वीरें देखी जा सकती हैं ।

                          (Kirti Mandir, Porbander, Gujarat)

       दोपहर का खाना पोरबन्दर में खाकर हमलोग सोमनाथ की और बढ़ने लगे । 105 किलोमीटर की दूरी और तय करनी थी । सड़कें काफी अच्छी थी । सड़क की दाई और समुद्र की लहरें बीच-बीच में दिखाई देती।पवनचकियां और हरी-भरी झाड़ियाँ के बीच से टैक्सी गुजर रही थी । झाड़ियाँ बीच-बीच में इतनी घनी थी, लग रहा था मानों जंगल में चल रहे हैं । जहां तक नजर जा रही थी सिर्फ नारियल के पेड़ ही दिख रहे थे । अंगूर के गुच्छे की तरह बड़े-बड़े हरे नारियल के फल पेड़ से लटक रहे थे । घनघोर वारिश हो रही थी। लगभग 3 घंटे के सफर के बाद हमलोग सोमनाथ मंदिर पहुँच गए।

                                           (Somnath Temple)

      हिन्दू धर्म में सोमनाथ मंदिर का अपना एक अलग ही स्थान है। सोमनाथ मंदिर, शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला स्थान प्राप्त हैं। कहते है, देवों के देव महादेव, अपने इस दर पर किसी भी भक्त को खाली नहीं लौटने देते । मुसलाधार बारीश में हमलोग मंदिर की ओर बढ़ रहे थे । विशाल धवज जो हजारो वर्षों से भगवान सोमनाथ का यशगान करता आ रहा है, जिसे देखकर शिव की शक्ति का, उनकी ख्याति का अहसास होता है । आसमान को स्पर्श करता मंदिर का शिखर देवादिदेव की महिमा का बखान करता है । मंदिर की अचूक सुरक्षा वयवस्था थी । सोमनाथ मंदिर का इतिहास बताता है की समय-समय पर मंदिर पर कई आक्र्रमण हुए और तोड़-फोड़ की गयी । मंदिर पर कुल 17 बार आक्र्रमण हुए और हर बार जीर्णोद्धार कराया गया । नवीन सोमनाथ मंदिर 1962 में निर्मित हुआ । कहते हैं -सृष्टि की रचना के समय भी यह शिवलिंग मौजूद था । ऋग्वेद में इसके महत्व का बखान किया गया हैं। धर्मग्रंथो के अनुसार श्राप से मुक्ति पाने के लिए चंद्रमा ने यहाँ भगवान शिव की आराधना की थी । चंद्रमा ने श्राप से मुक्त होकर यहाँ शिवजी का स्वर्ण मंदिर बनबाए और इसमें जो ज्योतिर्लिंग स्थापित हुआ, उसका नाम चन्द्रमा के स्वामी यानि सोमनाथ पड़ गया ।

                                            (Somnath Temple)
      मंदिर के अंदर पहुँचते ही पहली भेंट भगवान के प्रिय वाहन नंदी से होती है, जिन्हे देखकर ऐसा लगता है, मानो नंदी भगवान के हर भक्त की अगुवाई कर रहा हों । मंदिर के अंदर पहुंच कर एक अलग दुनिया में होने का एहसास होता है । मस्तक पर चन्द्रमा को धारण किये हुए देवों के देव महादेव, का बड़ा शिवलिंग है', जिसपे चन्दन से ॐ अंकित था। बेलपत्र और फूलों की माला का श्रृंगार से सजे शिवलिंग का नजारा बेहद खूबसूरत था उनके दोनों किनारे भगवान ब्रह्मा और विष्णु की मूर्तियाँ क्रमश: दायां और बायां अवस्थित है। हमलोगो ने पूजा- अर्चना करके बाहर निकल आये।मंदिर प्रान्त में शाम 7 :30 बजे से 8 :30 बजे तक साउंड और लाइट शो चलता है , जिसमे मंदिर के इतिहास का बड़ा ही सुन्दर चित्रण होता है । रात्रि में होटल जयसोमनाथ में हमलोग ठहरे ।सुबह आरती के समय हमलोग फिर उपास्थित हुए ।भगवान सोमनाथ की पुजा के बाद मंदिर के पुजारी भगवान के हर रूप की आरधना करते है, जिसे देख्नना अपने आप में सौभाग्य की बात है, अंत में उस महासागर की आरती उतारी जाती है जो सबसे पहले उठकर अपनी लहरों से भगवान के चरणों का अभिषेक करता है ।

                                   (Lord Shiva, Jyotirling)

        हमलोग वहाँ से निकट में स्थित भलका तीर्थ मंदिर गया । यहाँ पर श्री कृष्ण की एक लेटी हुई प्रतिमा है। कहा जाता है कि यहीं पर "जर" नामक एक शिकारी ने श्री कृष्ण को हिरन समझ कर तीर मारा था जिससे घायल हो कर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए थे। इसी के आगे त्रिवेणी संगम है जहाँ तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है। इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है। मान्यताओं के अनुसार, यहीं पर श्री कृष्ण के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार हुआ था । इस जगह पे आ कर मन में अजीब सी भावना उत्पन्न होती है जिसे शब्दों में बखान करना नामुमकिन है। त्रिवेणी संगम के ही निकट गीता मंदिर है। इसकी दीवारों पर गीता के अध्याय लिखे हुए हैं। इस मंदिर के बहार पत्थर और कढाई के अनेको सामान मिलते हैं । मैंने वहां से चाभी के छल्ले बैग, आदि अनेक वस्तुएं खरीदीं। सोमनाथ के तट पर बाणगंगा, नामक  एक तीर्थ है। इस जगह पर एक शिव लिंग है जो की समुद्र के अन्दर स्थित है। लोग इसका छूकर  दर्शन करते हैं पर क्योंकि मुझे तैरना नहीं आता था, इसलिए मैंने इसके दूर से ही दर्शन कर लिए। इन सभी मंदिरों का दर्शन आप 3-4 घंटों में कर सकते है।

                                 
        (Lord Sri Krishna, Bhalka Tirth Mandir, Somnath, Gujarat)

      हमलोग वहां  से पुनः वापस लौट आये , लेकिन अभी तक वहां की स्मृतियाँ तरोताजी है, जो हमलोगो ने इस यात्रा के दौरान अनुभव किया । कुछ चीजे हमारे पास होती हैं, पर उसका एहसास हम बाद में करते है।  कहा जाता है, तेरी याद आई- तेरे जाने के बाद। आपसे आग्रह है कि आप गुजरात दर्शन अवश्य करें, पर्यटकों को लुभाने के लिए यहाँ बहुत कुछ हैं। भारत भ्रमण , गुजरात यात्रा के बिना अधूरी मानी जाती हैं।
  

4 comments:

  1. bahut acchi jaankari lekin aapne kahi bhi yeh details nahi di ki aapne apna tour kaise plan kiya tha. texi or hotel kaise book kiya tha or kitne din ka tour tha

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  2. Bahut sunder jankari aap see mili

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  3. The full details of dwarkadham,somnath jyotirling,and nageshwar jyotirling , thanks for beautiful knowledge 🙏🏻

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